रविवार, 21 फ़रवरी 2016

गुरु कृपा: सोमा शाह की कहानी (Guru Kirpa: Story Of Soma Shah)

यह कहानी सिख धर्म के चौथे गुरु, श्री रामदास जी के वक्त ही हैं।

अमृतसर में एक बहुत ही गरीब परिवार था। सोमा नाम का एक छोटा सा बालक था। उसकी माता काफी बूढ़ी हो चुकी थी। वह सोमा से कहती है कि तुम पर तुम्हारे पिता जी का साया नहीं है ,मुझसे अब और मेहनत नहीं होती, मैं बूढ़ी हो चुकी हो हूँ, अब मुझसे कोई काम नहीं हो पाता, इसलिए अब तुम कोई काम किया करो। तो सोमा कहता है की माता जी मैं क्या काम करूँगा, मैंने तो कभी कोई काम नहीं किया। माता जी कहती है की मैं तुम्हे चने उबाल कर दिया करूंगी और तुम उसे बेच आया करना। सोमा कहता हैं माँ मैं कहा पर बेचा करूंगा ,माँ कहती है कि तुम श्री दरबार साहिब (Golden Temple) के सामने जाकर बेचा करना क्यूंकि गुरु जी के दर्शन करने को बहुत संगत (भक्त) आती है, वहाँ तुम्हारे चने खूब बिका करेंगे। एक तो तुम घर के लिए कुछ कमा कर ले आया करोगे और साथ ही साथ सतगुरु की बाणी भी सुन लिया करोगे।

सोमा अगले दिन से दरबार साहिब के बाहर चने बेचने के लिए जाने लगा और जमीन पर दरी (Carpet) बिछाकर उस पर बैठकर बेचने लगा।

सोमा का दिल इतना दयालु था की अगर वो किसी गरीब को देखता की उसके पास पैसे नहीं है पर उसका खाने का मन है तो वो मुट्ठी भरकर चने उसको भी दे देता कि कही गरीबी के कारण ऐसा न हो उसका मन उदास ही रह जाये और वो खा न सके।

सोमा रोज दरबार साहिब के सामने चने बेचने जाता था। एक बार की बात है, सोमा हमेशा की तरह श्री दरबार साहिब के सामने बैठा था और तभी श्री गुरु रामदास जी अंदर से बाहर आये। तब गुरु जी देखते है की सामने एक बच्चा दरी बिछाये बैठा है और उसने फ़टे-पुराने कपड़े पहन रखे हैं और कह रहा है की "चने लेलो, चने।" गुरु जी पहले उस बच्चे की और देखते रहे फिर उसकी तरफ गए और उससे पूछने लगे की तुम्हारा क्या नाम है।

सोमा एकदम से खड़ा हो गया जब गुरु जी उसके सामने आकर उससे पूछने लगे ,उनको हाथ जोड़कर कहता है कि "गुरु जी मेरा नाम सोमा है।"

गुरु जी आगे पूछते है कि "सोमेआ तू किन्ने पैसे वट्टे है।"

सोमा एकदम से अपनी दरी के निचे रखे पैसे निकलता है और गिनकर कहता है कि "गुरु जी चालीस (40) पैसे।"

गुरु जी कहते है कि यह चालीस पैसे मुझे दे दो। सोमा एकदम से उनके आगे सभी पैसे कर देता है और गुरु जी को दे देता है। इसके बाद गुरु जी चले जाते है।

घर पर उसकी माँ उसका इन्तजार कर रही होती है क्यूंकि उनके गरीबी इतनी थी की जितना दिन-भर कमाते थे उतना ही उसी दिन लग जाता था। सोमा घर आता है तो माता जी कहती है कि "आज कितने पैसे कमाये है,जल्दी पकड़ाओ, मैं कुछ खाने को लेकर आती हूँ ।"

सोमा कहता है कि "माँ आज गुरु जी मेरे पास आये थे और मैंने सारे पैसे उन्हें दे दिए।

माँ कहती की यह तो तुमने बहुत अच्छा किया ,तुम बहुत भाग्यशाली हो जो गुरु जी तुम्हारे पास आये और तुमने उन्हें सब पैसे दे दिए और कहती है कि हम कुछ और खा लेंगे घर में जो भी रुखा-सुख पड़ा होगा।

अगले दिन सोमा जब जाने लगता है तो उसकी माँ कहती है की अगर आज भी गुरु जी तुम्हारे पास आये तो सारे पैसे उन्हें दे देना।

दूसरे दिन भी जब सोमा जाता हैं ,सारा दिन चने बेचता है और जब शाम होती है गुरु जी फिर से आ जाते है और पूछते है "सोमेआ आज  किन्ने पैसे वट्टे ने।"

सोमा कहता है कि गुरु जी आज मैंने तीस (30) पैसे वट्टे है और अपने आप ही सारे के सारे पैसे गुरु  पकड़ा देता है।

सोमा जब घर आता है तो अपनी माँ से कहता है "माँ आज फिर गुरु जी आये थे और मैंने सारे पैसे उन्हें दे दिए।

माँ कहती है कि यह तो बहुत अच्छा किया तुमने ,गुरु साहिब जी की तुम पर कृपा है।

लेकिन आज घर में खाने को कुछ भी नहीं था और माँ कहती  कि कोई बात नहीं अगर कुछ खाने को नहीं है गरीबी में ऐसे दिन आ ही जाते है। माँ कहती है की आज हम पानी पीकर ही सो जायेंगे। सोमा और माँ दोनों पानी पीकर ही भूखे सो जाते है। लेकिन फिर भी दोनों खुश है क्यूंकि गुरु जी की उनपर कृपा है और दोनों उनकी प्राथना करते हुए सो जाते है।

तीसरे दिन सोमा फिर से जब जाने लगता है तो माँ समझाती है कि गुरु जी हम पर मेहरबान है ,अगर आज भी वो आये तो सारे पैसे उन्हें दे देना और मन में कुछ भी गलत मत सोचना क्यूंकि गुरु जी की हमपर कृपा है। अगर वो खुद न आये तो सारे पैसे उन्हें देने खुद चले जाना।

 सोमा सारा दिन चने बेचता है जब शाम को गुरु जी का इन्तजार करता रहता है लेकिन गुरु नहीं आते। तो सोमा अपनी दरी उठाता है और खुद अंदर चले जाता है।

गुरु जी गुरु-घर में बैठे होते है और देखते है कि सामने से एक छोटा-सा गरीब बच्चा भागता हुआ आ रहा है। सोमा जैसे ही गुरु जी के पास आता है तो उनके पैर पकड़ लेता है और कहता है कि "गुरु जी मुझसे क्या गलती हो गयी जो आज आप नहीं आये ,क्या मेरी भावना सच्ची नहीं ?"

गुरु जी कहते है नहीं सोमेआ नहीं ,आज तुमने कितने पैसे वट्टे है।

सोमा कहता है गुरु जी पंद्रह (15) पैसे और सारे पैसे निकालकर गुरु जी के चरणों में रख देता है।

गुरु जी कहते है कि एक बात समझाओ तुम्हे हर रोज घाटा क्यों पड़ता जा रहा है।

सोमा की आँखों से आंसू निकल आते है और कहता है कि गुरु जी मैं  बहुत ही गरीब हूँ , जितने पैसे होते है रोज आपको दे देता हूँ और आगे कहता है कि गुरु जी मेरे पास जितने भी पैसे थे सभी ख़त्म हो गए ,अब कल से मैं नहीं आऊंगा।

गुरु जी कहते है "सोमेआ क्यों झूठ बोल्दा ऐ। तू ता बड़ा ही अमीर है।"

सोमा कहता है "नहीं गुरु ,मैं बहुत गरीब हूँ।

गुरु जी बार बार यह ही कहते कि तुम अमीर हो।

ऐसा बार-बार सुनकर सोमा गुरु जी से कहने लगा की गुरु जी मैं बहुत गरीब हूँ। तीन दिन हो गए मैंने और मेरी माँ ने खाना नहीं खाया,हम तीन दिनों से भूखे है ,मैं बहुत ही गरीब हूँ।

सोमा रोते-रोते गुरु जी से कहता है कि गुरु जी तुसी मेरी हालत नहीं जानते।

सोमा जब ऐसे कहता है गुरु जी एकदम से खड़े हो जाते है और उसको अपने गले लगा लेते है और सिर पर हाथ रखकर कहते है कि तुम्हारी हालत मुझसे ज्यादा कौन जान सकता है। अब तुम गरीब नहीं रहोगे।

बस फिर क्या था गुरु जी ने उसपर कृपा कर दी ,कुछ ही महीनों में ऐसा चमत्कार हुआ कि सोमा गरीब से अब सोमा शाह बन गया। पुरे अमृतसर में उसे "शाहों का शाह सोमा शाह" कहने लगे।

गुरु की कृपा इतनी महान होती है कि बिल्कुल ही गरीब सोमा को जिसके पास गुजारा करने के लिए भी पैसे नहीं थे लेकिन जब गुरु जी की कृपा हुयी तो वो सबसे अमीर शाह बन गया। पहले गुरु जी बस अपने भक्त की परीक्षा ले रहे थे क्यूंकि गुरु जी तो सब कुछ जानते थे। यह है गुरु कृपा कि एक सच्ची मिसाल।
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