रविवार, 15 मई 2016

सत्संग क्यों जरूरी है (Why Satsang is Important)







सत्संग क्यों जरूरी है ? यह जानने से पहले यह जान लेते है कि सत्संग होता क्या है। किसी भी प्रकार से ईश्वर की भक्ति करना सत्संग ही है। भजन-कीर्तन करना ,ईशवर की भक्ति करना ,अथवा अपने साथियो के साथ बैठकर अगर हम ईश्वर के बारे में बाते भी कर ले तो वो भी सत्संग ही है। किसी भी प्रकार से ईश्वर के गुणों के व्याख्यान को ही सत्संग कहते है।


बहुत से लोग सत्संगी होते है और बहुत से लोग सत्संगी नहीं भी होते। जिन लोगो को सत्संग पसंद नहीं होता वह अक्सर दूसरों को भी कहते है कि सत्संग करने से क्या होगा। कुछ नास्तिक लोग यह भी कह देते है कि सत्संग करने से क्या होता है ? Life को enjoy करो ,इसके बाद क्या होगा कौन जाने ? मृत्यु तो होनी ही है, चाहे सत्संग करो और चाहे न भी करो। इसलिए life को enjoy करो। जो भी सत्संग करते है अक्सर वो ऐसे कुछ न कुछ लोगो से जरूर मिले होंगे जो बस ऐसे ही बे-मतलब बोलते रहेंगे। जो सत्संगी होते है वह अक्सर ऐसे लोगों से दूर ही रहते है।



तो अब एक छोटी-सी example से जानते है कि सत्संग का क्या महत्व है----



एक बार एक युवक सत्संग में ही लीन था। हर समय प्रभु का नाम जप्त रहता था। पर एक दिन उसके मन में एक विकृत भाव पैदा हो गया कि मृत्यु तो सभी की ही आनी है चाहे सत्संग करें और चाहे मौज-मस्ती करें। लेकिन फिरसे उसके मन में सतसंग के ख्याल आ जाते। वो इसी दुविधा में फंसा हुआ था कि सत्संग का क्या महत्व है।



एक बार उसकी मुलाक़ात एक वृद्ध साधु बाबा से हुई। उस युवक ने साधु बाबा से भी यही प्रश्न पूछा कि, "बाबा जी ,मृत्यु तो सभी की ही होनी है चाहे कोई सत्संग करें और चाहे न करें तो सत्संग करने का क्या महत्व है।"



साधु बाबा समझाने लगे ,"बेटा ,जब शेरनी अपने शिकार को पकड़ती है तो दांतों से पकड़कर उसे मारकर खा जाती है और जब वही शेरनी उन्ही दांतों से अपने बच्चे को पकड़ती है तो उसे वह बहुत ही प्यार से नाजुक तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देती है। शेरनी भी वही है ,दांत भी वही है और मुंह भी वही है। बस प्रेम का फर्क है। "



साधु बाबा आगे कहने लगे ,"ठीक इसी प्रकार जो सत्संग करते है , प्रभु का नाम लेते है ,प्रभु को हर समय याद करते है ,उनका प्रभु को भी ख्याल रहता है और मृत्यु आने पर प्रभु उन्हें अपने धाम में जगह देते है और जन्मों-जन्मों के बंधन से मुक्त कर देते है और जो सत्संग नहीं करते ,प्रभु का नाम नहीं जपते वह 84 के चक्कर में चक्कर काटते रहते है और काटते ही रहते है। "



अब युवक सत्संग के महत्व को समझ गया था और फिर से सच्चे मन से सत्संग में ही लीन रहने लग गया।



इसलिए जो भी सत्संग करते है ,प्रभु का नाम लेते है वह प्रभु के धाम में ही जगह प्राप्त करते है और पाप-कर्मो से मुक्ति पाते है। तो हमेशा प्रभु का नाम जपते रहिये। अगर आपने अभी तक प्रभु का नाम जपना शुरू नहीं किया तो अभी से कर दीजिये क्यूंकि अभी भी देर नहीं हुई।
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