रविवार, 9 अप्रैल 2017

सच्चा भक्त कौन और कैसा होता है? (Who Is True Devotee)

दोस्तों आज GyanPunji पर भक्ति के विषय में लिखने का प्रयास करूँगा। वैसे भक्ति और प्रेम ,यह दो ऐसे  शब्द है ,जिनका शब्दो में वर्णन करना बहुत ही कठिन है और जिस मनुष्य में यह दो भाव जितने गहरे होते जाते है ,उसके लिए शब्द उतने ही कम हो जाते है। क्योंकि इन भावो की जितनी गहराई होगी ,वहां शब्द उतने ही फीके हो जाते है ,यह भाव तो शब्दो और अर्थों से कही अधिक गहरे है और इसीलिए मुख से इनका वर्णन भी कठिन है क्योंकि यह भाव तो दिल और आत्मा से जुड़े होते है।



भक्ति......... ? क्या है भक्ति ? क्या सिर्फ किसी देवी-देवता की पूजा करना ही  भक्ति है ? या फिर किसी ख़ास पाठ का नियमित पाठ है भक्ति ? या फिर देवी-देवता के विषय में ज्ञान को भक्ति कहते है ?

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क्या इन्ही में से किसी एक को या फिर सभी को भक्ति कहते है ? चलो पहले इन तीनो पर गहराई से विचार करते है और फिर बाद में असल भक्ति क्या है ,उसके बारे में बात करेंगे।


क्या देवी-देवता की पूजा करना ही भक्ति है ?



कई लोग सोचते है कि किसी देवी-देवता की पूजा कर ली तो वह उनका सच्चा भक्त हो गया। लेकिन क्या यह सच्ची भक्ति है ? Mostly जो भी ऐसा सोचते है ,वह करते क्या है कि शरीर या मुख से तो देवी-देवता की पूजा कर रहे होते है ,लेकिन उनका मन कही और ही भटक रहा होता है। मंदिर में गए....... समय थोड़ा अधिक लग गया ,अरे यह क्या ....... साथ ही भक्त सोचने लग जाएगा .....,यार ,मेरा तो सीरियल शुरू हो गया होगा ,चलो जल्दी-जल्दी घर चलता हूँ ,जितना छूट गया होगा वह youtube से देख लूंगा। अगर सीरियल नहीं ,तो फिर cricket match का क्या बना ? कौन जीत रहा होगा ? कोहली ने शतक लगा दिया होगा या फिर आउट हो गया होगा ? चलो फटाफट घर जाकर देखते है। अगर ज्यादा ही जल्दी होगी तो फिर ,भक्ति की थोड़ी-सी break और मोबाइल का lock खोल और Cricbuzz से score देखने शुरू।






यह भक्ति कैसी हुयी ,समझ ही गए होंगे सभी।



अब दूसरी भक्ति ..........

नियमित पाठ 


नियमित पाठ करना अच्छी बात है। इससे इंसान में अच्छे विचारों के साथ-साथ सकारत्मकता भी आती है। लेकिन कई लोग ,दूसरे लोगो के सामने ......मुझे यह पाठ आता है ,मुझे वो पाठ आता है...... या फिर पाठ करते-करते ध्यान वही Cricbuzz या फिर TV Serial की तरफ।



यह भक्ति भी कैसी हुयी आप समझ ही गए होंगे।

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अब तीसरी भक्ति की बात करते है-


देवी-देवता के बारे में जानकारी ,कुछ अधिक ही जानकारी



धर्म के बारे में जानकारी होना अच्छी बात है ,लेकिन धर्म के बारे में जानकारी होकर अपने ही धर्म या किसी दूसरे के धर्म के खिलाफ बोलना ,यह क्या बात बनी ? वो भी बिना किसी मतलब के। धार्मिक बन गए ,धर्म के बारे में भी जानकारी है ,लेकिन उस जानकारी का इस्तेमाल किसी को नीचा दिखाने के लिए करना ,यह क्या बात बनी ? अब अधिकतर सभी लोग सोचेंगे कि कोई धार्मिक जानकारी का कैसे गलत इस्तेमाल कर सकता है।  बहुत-से ऐसा सोचेंगे ही ,ऐसी ही मेरी एक Post पुस्तके भी सोच-समझकर पढ़नी चाहिए में भी अधिकतर लोगों ने यही सोचा कि कोई गलत किताब क्यों लिखेगा ,उसका जवाब भी मेरे पास था ,लेकिन उन किताबों का मैं नाम नहीं बता सकता था ,क्योंकि अगर नाम बता दिया तो लोग उसके बारे में और भी अधिक जानने लग जाएंगे। 


लेकिन भक्ति की जानकारी कैसे गलत इस्तेमाल होती है? ,यह आपको थोड़ा-बहुत बता सकता हूँ। Youtube पर videos तो अधिकतर सभी देख ही लेते है ,बस वही पर बहुत-सी ऐसी videos मिल जाएंगी और ख़बरों में भी कभी-कभी ऐसी बाते आ ही जाती है। ऐसा mainly दो कारणों से होता है ,जब भक्त को ,जिस देवी-देवता को वह मानता है उसके बारे में सब मालुम होता है और कुछ लोग (जोकि द्वेष फैलाने वाले होते है) ,कुछ मार्मिक बातों को तोड़-मरोड़कर कुछ इस तरह पेश करते है कि उनका ,जिनकी वह भक्ति करते है उनपर से विश्वास उठ जाता है। यह कैसी भक्ति हुयी ? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐसे भक्तों के पास जानकारी होती है लेकिन तर्क नहीं होते। सिर्फ जो पढ़ा ,जितना पढ़ा ,बस उतना ही मानते है ,इससे आगे सोच-समझ नहीं होती। 



दूसरे तरह के लोग जो गलत जानकारी फैलाते है ,उनकी बात रहने दीजिये ,शायद आप समझ गए हो। अगर नहीं समझे तो वो भी Youtube पर ही पता लग जाएगा जो अपनी जानकारी से दूसरों को भ्रमित करते है और गलत तरीके से तर्क पेश करते है। 



ऐसी भक्ति भी  भक्ति हुयी क्या  ? जो अपने इष्ट के ही विरुद्ध हो जाए ?

दोस्तों आपने तीन तरह के भक्तो की भक्ति भावना के बारे में जान लिया (भक्ति भावना अन्य तरह की भी हो सकती है ,भक्ति भावना और भक्ति के भेद अलग-अलग बाते है). अब बात करते है असल भक्त की भक्ति की। ऐसी भक्ति जो सर्वोच्च है। 


असल भक्ति ,सच्चा भक्त कैसा होता है ?




सच्चा भक्त.........  और सच्ची भक्ति..............  वैसे तो इसके बारे में कहना बहुत कठिन है,क्योंकि भक्ति की गहराई की कोई सीमा नही होता। लेकिन सच्ची भक्ति ने यह जरूरी नही कि भक्त सदैव पूजा-पाठ करने वाला ही हो या फिर उसे अपने इष्ट के बारे में सम्पूर्ण जानकारी ही हो।



क्योंकि सच्ची भक्ति तो सच्ची लगन और निष्ठा के साथ होती है। ऐसी भक्ति में इष्ट ,सिर्फ इष्ट न रहकर सखा, माता-पिता, भाई-बंधु किसी भी रूप में भक्त को प्रिये हो जाता है।



एक सच्चा भक्त, अपने इष्ट से कभी नही कहता कि मुझे यह चाहिए, मुझे वो चाहिए, क्योंकि जिस प्रकार एक नवजन्मे बालक (जिसने अभी तक बोलना न सीखा हो) के माता-पिता को मालूम होता है कि उसे किस चीज की आवश्यकता है और किस चीज की नही,उसी प्रकार ही भक्त के लिए ईश्वर होते है। भक्त जानता है कि उसके प्रभु उसका ख्याल अपने आप रख लेंगे उसे कुछ भी कहने की जरूरत नही।



लेकिन ऐसे सच्चे भक्त को सिर्फ एक ही लालसा होती है कि उसके ईश्वर उसे एक बार उसकी आँखों को भी दर्शन करा दे। मन मे भले ही हज़ारो बार अपने भगवान के दर्शन किये हो, लेकिन एक बार सिर्फ शरीर की आंखों को भी दर्शन करा दे।






ऐसी भक्ति जितनी गहरी होती जाती है ,उतना ही अहम भाव भी खत्म होता जाता है। जैसे अन्य व्यक्ति तो कह देते है,मैं ऐसे करता हूँ, मैं वैसे करता हूँ...... मुझे यह यह आता है..... वगैरह वगैरह। लेकिन सच्चा भक्त इन बातों से दूर होता जाता है क्योंकि वह तो भगवान के करीब है और जो भगवान के करीब होते है उनके विकार भाव नही रहते ।

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ऐसे भक्त तो किसी के साथ भी वैर-विरोध नही रखते। अगर कोई इन्हें कुछ कह भी दे तो भी बात हंसकर ताल देते है या फिर अनसुनी कर जाते है। ऐसे व्यक्ति तो सभी से सिर्फ प्रेम करना जानते है क्योंकि सभी जीव परमपिता परमात्मा की ही सन्तान है, यह बात एक भक्त भली भांति जानता है और कभी भी जीव-हिंसा नही करता और न ही कुछ भी तामसिक भोज्य पदार्थ ग्रहण करता है।



भक्ति में ऐसी शक्ति है जो अंधे को भी देखने की क्षमता दे देती है। जिससे लंगड़ा व्यक्ति भी दौड़ने लग जाता है और गूंगा भी बोलने लगे जाता है। यानी कि जो कुछ भी इस संसार मे संभव नही वह भी संभव हो जाता है।



क्यों......, यह बात हजम नही हुई कि लंगड़ा भी दौड़ने लग जाये? लेकिन मैंने आंखों से ऐसा देखा हुआ है कि लंगड़ा व्यक्ति भी दौड़ता है। लंगड़ा व्यक्ति भी जब दौड़ने लगा.... इसपर भी जल्द ही आप एक पोस्ट पढेंगे ।



भक्ति से ऐसी-ऐसी शक्तियां आ जाती है जो कोई विज्ञान के नजरिये से सोच भी नही सकता। हमारे भारत का तो इतिहास भी गवाह है कि भक्ति में सबसे अधिक बल है। ईश्वर स्वयं भी भक्त की रक्षा करने आ जाते है, ऐसी बाते तो कोई भौतिकतावादी सोच भी नही सकता कि ऐसा असल मे भी होता होगा।

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दोस्तों, कुछ-कुछ ऐसे ही होते है सच्चे भक्त.... उनके बारे में लिखने का प्रयास तो मैंने किया लेकिन जो उनकी भक्ति होती है ,जो उनकी श्रद्धा और उनका विश्वास होता है.... वह तो वही जाने जो ऐसा होता है क्योंकि अगर हम जानते होते तो इस दुनियादारी में ही लीन न रहते। हो सकता है शायद आप मे से भी कोई ऐसा हो, जिसे ईश्वर का सानिध्य प्राप्त हो। या फिर कोई अपने प्रभु के निकट आना चाहता हो तो उसे भी सिर्फ ईश्वर पर भरोसा रखने की जरूरत है और फिर भगवान आपका भरोसा कभी भी टूटने नही देंगे।



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1 टिप्पणी:

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