गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

माँ का प्यार और बच्चों की झूठी आजादी

दोस्तों यह कहानी आजकल की सच्चाई है। मां का प्रेम तो असीम होता है, लेकिन आजकल के बच्चे इसे समझ नही पाते। वह तो बस थोड़ा पैसा क्या कमा लिया अब उन्हें आजादी चाहिए और वह अपने माँ-बाप को संभालने में ही असमर्थ हो जाते है।



चलिए पहले एक मां के दिल की व्यथा के बारे में जानते है।



प्रीतम अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा था। माता-पिता ने उसे पढ़ा-लिखाकर एक बढ़िया इंसान बना दिया और वह अच्छी जॉब पर भी लग गया। जॉब के कारण प्रीतम (जॉब शहर से बाहर लगी) घर वालो से दूर रहता था और वैसे भी पढ़ा-लिखा होने के कारण उसे अब आजादी चाहिए थी और वह घर वालों से दूर ही रहना पसंद करता था।






समय गुजरा ,विवाह लायक उसकी उम्र हुई तो उसका विवाह भी हो गया। जहां पर प्रीतम रहता था ,वहां कई बार उसके माता-पिता ने भी आने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उनका बेटा तो हमेशा कुछ-न-कुछ कहकर टाल ही देता और कहता कि काम के कारण वह उनके पास तो रुक पायेगा नही और प्रीति (प्रीतम की पत्नी) के पास भी समय कम ही होता है, आप यहां आकर क्या करेंगे? क्योंकि इस आजकल के लड़के को तो आजादी चाहिए थी और घर वाले अगर कुछ कह दे तो वह इसे पसन्द न था, इसलिए अपने पास बुलाने से इनकार कर दिया।

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कुछ समय और गुजरा, प्रीतम के पिता जी का देहांत हो गया और अब उसकी मां अकेली कैसे और कहा रहती? प्रीतम अपनी मां से बोला, "मम्मी, आप तो जानती ही है कि हमे दिन भर कितने काम होते है। आप वहां आएंगी तो बेवजह आपको तकलीफ होगी,इसलिए हमने सलाह की है कि आपको हम वृद्ध आश्रम छोड़ दे,वहां वह अच्छे से आपका ख्याल रखेंगे। अगर आपको कोई भी तकलीफ हो तो आप हमें कह दीजियेगा।"



ज्यादा प्रीतम क्या बोलता? मां तो मां होती है और वह समझ गयी कि उसे अपने पास नही रखना चाहते और अंदर ही अंदर अपने दुख को दबा लिया और उनकी खुशी के लिए वृद्ध आश्रम में रहने को भी हां कर दी।



वृद्ध आश्रम में कभी कभी दोनों बच्चे(बेटा और बहू) अपनी मां से मिलने आ भी जाते लेकिन मां उनसे कभी कोई शिकायत न करती। समय बीता.... उनकी भी (माता की) उम्र हो चली और वह भी अंतिम सांसे ले रही थी, तो Formality के लिए उनका बेटा और बहू भी मिलने आ गए। मां ने अपने बेटे से एक ही बात कही, "बेटा.... मैंने आज तक तुमसे कुछ न मांगा, लेकिन जिंदगी के अंतिम पलों में तुमसे कुछ मांगना चाहती हूं।"



बेटा हैरान कि पता नही मां इस समय भी क्या कह देगी? लेकिन फिर भी बोला-" जी, बोलिये.... मैं जरूर आपकी इच्छा को पूरा करने का प्रयास करूंगा।"

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मां बोली," बेटा ... वृद्ध आश्रम में कुछ cooler वगैरह लगवा देना और साफ तथा ठंडे पानी के लिए water cooler भी लगवा देना। बस यही अंतिम इच्छा है। क्योंकि यहां पर गर्मियों में गर्मी बहुत होती है और कोई cooler या AC भी नही है। पीने के पानी की भी काफी दिक्कत होती है।



बेटा फिर थोड़ा हैरान हुया और फिर बोला,"लेकिन मां.... अब क्यों? आजतक तो आपने मुझसे कोई शिकायत नही की आश्रम के बारे में। और अब, इस अंतिम समय मे यह सब?"




मां बोली(आंखों से कुछ आंसू भी निकलने को हो रहे थे) ,"बेटा मेरी तो कोई बात नही, सब कुछ सह लिया और कुछ अधिक परेशानी भी न हुई। लेकिन मैं अपने बेटे को जानती हूँ, अगर कल को उसे यहां आना पड़ा तो वह यहां आराम से न रह पाएगा और उसे बहुत कठिनाई होगी यहां रहने में ,इसलिए अंतिम समय मे यह सब मांग रही हूँ।"



आगे क्या हुआ, क्या नही हुआ.....यह सब छोड़िये..... कहानी इतनी ही है। माँ तो सब कुछ समझती है, बेटे के नकारने के बावजूद भी अंतिम समय मे भी उसके बारे में ही सोचती रही। लेकिन वही बेटा अपनी मां के बारे में एक पल भी न सोच सका और सब कुछ भूलकर उसे ही अपने से दूर कर दिया,जिसने उसका हमेशा से ख्याल रखा।

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दोस्तों , यह आजकल की सच्चाई बनती जा रही है कि बच्चे अमीर होने के बावजूद भी अपने माँ-बाप को नही संभाल पाते जबकि मां-बाप गरीब होने के बावजूद भी अपने बच्चों का भली-भांति पालन-पोषण करते है और उन्हें पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बनाते है कि वह कोई बड़ा अफसर वगैरह बन जाये। शायद ऐसे बच्चे अफसर बन भी जाते है, लेकिन सिर्फ अपने ही माँ-बाप के लिए। इनपर ही रौब करना,इनको ही बोलना और सिर्फ और सिर्फ अपनी मन-मर्जी करना। इतने बड़े अफसर हो जाते है कि माता-पिता को ही छोटा बना देते है।



wow..... बढ़िया....  अधिक पढ़ा-लिखा यही होता होगा? शायद आजकल के युग मे अमीरी का यही मतलब होता होगा कि कुत्तों को पाल लो,वह घर के सदस्य बन सकते है,उन्हें घूमा-फिरा सकते है,उनके लिए समय है , इसमे ही शानो-शौकत है। लेकिन अपने ही मां-बाप को नही संभाल सकते। उनके लिए जरा-सा समय भी नही है। उनके साथ कही घूमने नही जा सकते।






Great....... शायद आजकल का समय तरक्कियों मे है। इतनी तरक्किया हो रही है कि आजकल के लोग दूसरों के साथ इतने मिलनसार हो गए है कि बाकी के सभी लोग हमारे अपने है, जानवर परिवार का अटूट हिस्सा है। लेकिन जो अपना ही परिवार है,जिन्होंने हमे शिक्षा दी,पढ़ाया-लिखाया, हमारे लिए सब कुछ किया, सिर्फ वही नही हमारे.... उनके संस्कार अब पुराने है, वह old-age, old-people है जोकि young को कहा compete कर सकेंगे और इसलिए उनको साथ रखने में शर्म महसूस होगी ,लेकिन जानवर को पालने से इज्जत बढ़ेगी और लोग animal-lover कहेंगे।



बढ़िया सोच है भई.......??? बढ़िया है ..... या घटिया.... यह तो आप सब समझ ही गए होंगे? मेरा इस आर्टिकल को लिखने का मकसद सिर्फ इतना ही है कि कोई भी इतना न पढ़-लिख जाए कि घर वालों पर ही अफसरशाही झाड़ने लगे। पढ़ो-लिखो.... खूब कमायों.... लेकिन उस पढ़ाई-लिखाई का कोई फायदा नही जो अपनो से ही दूर कर दे और उस कमाई का भी कोई फायदा नही, जिसे कमाकर अपनो के लिए ही समय न बचे।

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ट्वीट से उठा लाउडस्पीकर-अज़ान विवाद : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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